मैं पिछले ३३ साल से बिहार से बाहर था। पहली बार इतने दिनों तक बाहर रहने के बाद बिहार को नजदीक से देखने परखने का मौका लगा।
जब मैं गुजरात में था तो मेरी शाखा में भागलपुर का ही एक क्लेरिकल स्टाफ अमित था जिसका ट्रांसफर होम रीजन गया था। रिलीविंग की रात वे सपरिवार हमारे निवास पर आये थे। उनकी पत्नी ने अनुरोध किया किसी तरह इनका ट्रांसफर रुकवा दीजिये। बिहार नहीं जाना चाहती हूँ। मैंने पूछा क्यों सौभाग्य की बात है कि चार वर्षों के बाद बैंक ने यह चांस दिया है कि आप अपने घर पर रहने का मौका पायीं हैं। ऐसी क्या बात हो गई!
उन्होंने जबाब दिया " नहीं अंकल आप देखिये न , यहाँ नहीं तो मच्छर है न तो मक्खी। वहां तो सड़क पर बजबजाती गन्दी नालियां हैं। यहाँ लड़कियां रात भी अकेली आ जा सकती है। यहाँ २४ घंटे बिजली है। न तो वोल्टेज का कोई प्रॉब्लम है और नो तो सडकों का। इन्होंने मुझसे पूछा भी नहीं कि मैं जाना चाहती हूँ भी या नहीं और ट्रांसफर के लिए अप्लाई कर दिया। आप प्लीज ट्रांसफर रुकवा दीजिये।
मैं तो उनका जबाब या यूँ कहें बिहार की बदहाली के वर्णन सुनकर बड़ा ही दुखी हुआ। मैंने कोशिश की और ट्रांसफर रुक गया।
आज मेरी पत्नी ने भी कुछ ऐसा ही कहा। उन्होंने कहा कि मुझसे ज्यादा समझदार तो अमित जी की पत्नी हैं। मैंने उन्हें समझाया कि उसकी तूलना मुझसे मत करो। उसकी नोकरी ३० साल बांकी है और मेरी १७ महीने। अंत में तो अपना भागलपुर ही काम देगा। गुजरात लाख गुना अच्छा है तो क्या हुआ नोकरी है तबतक हमारी पूछ है। बाद में तो अपना घर उत्तम है।
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